मानव और मानस
一जय श्री राम
मनुष्य और रामचरित मानस के मध्य एक अनूठा सम्बन्ध हैं अगर मनुष्य अपने जीवन के दिनचर्या को मानस के अनुसार ढालने का प्रयास करे और उनका अनुशरण करने की कोशिश करे तो एक बहुत बड़ा परिवर्तन या यूं कहें कि हमारे सनातन संस्कारो की रक्षा हो सकता हैं जिसकी आज हमें नितान्त आवश्यकता है क्योंकि रामचरित मानस में समस्त लौकिक सम्बन्धो को दर्शाया गया हैं,चाहे वह पिता -पुत्र हो,माता-पुत्र हो,पति -पत्नी हो,देवर-भाभी हो,सास- बहू हो ,भाई-भाई हो राजा -प्रजा हो ,पिता-पुत्री हो ,समधी-समधी हो,ससुर-दामाद हो तथा भक्त और भगवान हो सभी रिश्तो में पवित्रता झलकती है इन सबका अद्भुत चित्रण एवम समावेश देखने को मिलता है ।
अतः हम इसी संदर्भ में विचार करेंगे..
मै लोगो को सकारात्मक रूप से देखता हूं मेरा मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति में अच्छाई और बुराई दोनों रहता हैं क्योंकि मनुष्य,मनुष्य हैं पूर्ण रूप से भगवान नही ।मै लोगों के अंदर के अच्छाई को ढूंढ़ता हु और मुझे मिल भी जाता हैं ।मनुष्य भी ईश्वर का अंश है -
ईश्वर अंश जीव अविनासी,
चेतन अमल सहज सुखरासी।
गड़बड़ियां तो देवता लोग भी करते हैं जिसका उनको भी परिणाम मिलता है लेकिन जो गड़बड़ियों को बारबार दोहराता हैं तो वह अपराधी बन जाता हैं जिसका परिणाम कष्टदायी होता हैं।
हम मानव धरती पर सभी जीवों में बौद्धिक दृष्टि से सर्वोत्कृष्ट है ,हममे सोचने समझने की सबसे अधिक क्षमता होती है ,प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन मे प्राप्त सुख एवं दुख के अनुसार अपने आचरण से मजबूर हो जाता है ,लेकिन उसके अंदर एक सच छुपा होता है जो मानवता पर केंद्रित होता है ,वह जिस समाज एवं कुल में उत्तपन्न होता है और जिस प्रकार उनकी दिनचर्या गुजरता जाता है वह उसी के समान आचरण करता हुआ समाज को अपना अधिकतम पुरुषार्थ देने का प्रयास करता है क्योंकि वह जानता कि यह मनुष्य रूपी जीवन अनुपम है कोई भी इसे यूँ ही नही बिताना चाहता लेकिन हर कोई सफल नही हो पाता क्योकि समय और परिस्थिति की मार जिस मनुष्य पर पड़ता है उसे दुबारा ऊपर उठने में बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ता है इसका कुछ अनुभव मुझे भी हुआ
मुझे भी समय और परिस्थिति की भयंकर मार पड़ी है जिसमे मैंने अपनी जिंदगी की 50%सुखों से दूर होना पड़ा जिसमे एक मातृत्व सुख भी है ,मां की होते हुए भी नही होना ये मेरे जीवन का बहुत बड़ा अभिशाप एवम घुन है जिससे मैं हर रोज व्यथित होता हूं ।
कुछ लोग ऐसा कार्य भी करते हैं जिसे सभ्य समाज मे नही किया जाना चाहिए लेकिन मेरा मानना है कि वह इस कार्य को करने हेतु मजबूर है वह लाचार है जिंदगी से करे तो क्या करे ।
इन्ही सभी बातों पर रामचरितमानस का विषय केंद्रित है कोई इसे समझे तो सही ।
मानस केवल एक धार्मिक ग्रंथ ही नही अपितु मानव जीवन पर आधारित यथार्थ चित्रण है जिसे अवलोकन करने की जरूरत मानव समाज को हैं ।
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